Sonam Wangchuk | Sonam Wangchuk Biography in Hindi | जानिए सोनम वांगचुक कौन हैं,जो अनशन को लेकर चर्चा में बने हुए हैं, Sonam Wangchuk Biography in Hindi

सोनम वांगचुक भारत के प्रसिद्ध इंजीनियर,शिक्षा सुधारक,आविष्कारक और पर्यावरण स्नेही हैं।उनका जन्म 1 सितंबर 1966 को लद्दाख के उलेतोकपो में हुआ था। वह लद्दाख में शिक्षा और पर्यावरण की स्थिति सुधारने के लिए अपने अनूठे और व्यावहारिक आविष्कारों के लिए विश्व विख्यात हैं। यह पर्यावरण की रक्षा और लद्दाख के पारिस्थितिक तंत्र (Ecology) को बचाने के लिए कई बड़े और ऐतिहासिक अनशन कर चुके हैं। वर्तमान में सोनम वांगचुक भारत में शिक्षा सुधार और NEET पेपर लीक को लेकर काकरोच जनता पार्टी (CJP) के समर्थन में जंतर मंतर में 28 जून से अनिश्चितकालीन अनशन(भूख हड़ताल) पर बैठे हैं।उनके अनशन का आज (18 July) 21 वाँ दिन हैं,अभी पुलिस ने उन्हें अस्पताल भेजवा दिया।सोनम वांगचुक ने 23 जुलाई को केंद्रीय मंत्री जे पी नड्डा और जितेंद्र सिंह द्वारा वार्ता करने पर 26 वें दिन अनशन समाप्त कर दिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनके स्वास्थ्य और वजन रिकवरी को लेकर प्रार्थना की।मोदी जी ने एक वीडियो जारी करते हुए बताया कि इस संसद सत्र के दूसरे सप्ताह के सोमवार से इस विषय पर चर्चा होगी और एक कड़ा विधेयक लाने का प्रयास किया जाएगा। आज हम सोनम वांगचुक जैसे महान व्यक्ति का प्रारंभिक जीवन,आविष्कार,प्राप्त पुरस्कार और उनके द्वारा की गई मांग का विस्तार से अध्ययन करेंगे।

 सोनम वांगचुक: लद्दाख के 'रैंचो' और भारत के महान पर्यावरण योद्धा

सोनम वांगचुक भारत के एक बेहद प्रतिष्ठित इंजीनियर, शिक्षा सुधारक और पर्यावरण कार्यकर्ता हैं। लद्दाख के ठंडे और दुर्गम पहाड़ों में जन्मे सोनम वांगचुक आज वैश्विक स्तर पर सतत विकास (Sustainable Development) और पर्यावरण संरक्षण के प्रतीक बन चुके हैं। बॉलीवुड की ब्लॉकबस्टर फिल्म 'थ्री इडियट्स' (3 Idiots) का मुख्य किरदार 'फुनसुख वांगडू' (रैंचो) इन्हीं के वास्तविक जीवन, विचारों और आविष्कारों से प्रेरित था।
प्रारंभिक जीवन और शिक्षा
सोनम वांगचुक का जन्म 1 सितंबर 1966 को लद्दाख के एक छोटे से गाँव उलेतोकपो में हुआ था। शुरुआत में उन्हें पारंपरिक स्कूली शिक्षा नहीं मिली, बल्कि उनकी माँ ने उन्हें स्थानीय भाषा और व्यावहारिक ज्ञान सिखाया। बाद में उन्होंने राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान, श्रीनगर (NIT Srinagar) से मैकेनिकल इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल की। इस पढ़ाई के दौरान ही उन्होंने महसूस किया कि देश की मौजूदा शिक्षा प्रणाली रटने पर ज्यादा और व्यावहारिक ज्ञान पर कम जोर देती है।
 सोनम वांगचुक द्वारा किये गये क्रांतिकारी आविष्कार: 
'आइस स्तूप' (Ice Stupa)
लद्दाख जैसे ठंडे मरुस्थल में पानी की भारी कमी रहती है, खासकर खेती के सीजन में। इस समस्या को सुलझाने के लिए सोनम वांगचुक ने 'आइस स्तूप' नाम की एक अनूठी तकनीक विकसित की।
  • यह कैसे काम करता है? सर्दियों के मौसम में जो पानी बर्बाद हो जाता है, उसे पाइपों के जरिए ऊंचाई से वर्टिकल (सीधा ऊपर) स्प्रे किया जाता है। ठंडी हवा के संपर्क में आकर यह पानी जम जाता है और बर्फ के विशाल शंकु (Cone) का रूप ले लेता है, जो दिखने में बौद्ध स्तूप जैसा लगता है।
  • लाभ: यह कृत्रिम ग्लेशियर गर्मियों के महीनों (मई-जून) में धीरे-धीरे पिघलता है, जब किसानों को फसलों के लिए पानी की सबसे ज्यादा जरूरत होती है। इस अद्भुत आविष्कार के लिए उन्हें 2016 में प्रतिष्ठित 'रोलेक्स अवार्ड फॉर एंटरप्राइज' से सम्मानित किया गया।
SECMOL: शिक्षा में अनोखा बदलाव
1988 में सोनम वांगचुक ने SECMOL (Students' Educational and Cultural Movement of Ladakh) की स्थापना की। यह स्कूल मुख्य रूप से उन छात्रों को दाखिला देता है जो पारंपरिक बोर्ड परीक्षाओं में फेल हो जाते हैं।
  • यहाँ छात्र केवल किताबी ज्ञान नहीं लेते, बल्कि व्यावहारिक विज्ञान, खेती, सौर ऊर्जा और आत्मनिर्भरता सीखते हैं।
  • इस स्कूल का पूरा कैंपस सौर ऊर्जा से चलता है। वांगचुक ने मिट्टी और स्थानीय सामग्री का उपयोग करके ऐसे 'सोलर हीटेड बिल्डिंग्स' बनाए हैं, जो बाहर -15°C की भीषण ठंड होने पर भी बिना किसी हीटर या कोयले के, अंदर का तापमान +15°C बनाए रखते हैं।
पर्यावरण संरक्षण और 'जलवायु अनशन' (Climate Fast)
सोनम वांगचुक केवल बंद कमरों में काम करने वाले इंजीनियर नहीं हैं, बल्कि वे जमीन पर उतरकर पर्यावरण की रक्षा के लिए लड़ने वाले योद्धा हैं। हिमालय के संवेदनशील पारिस्थितिक तंत्र (Ecology) को बचाने के लिए उन्होंने कई बड़े आंदोलन किए हैं:
  • 21 दिनों का ऐतिहासिक जलवायु अनशन (मार्च 2024): लद्दाख के ग्लेशियरों को पिघलने से बचाने और वहां के पर्यावरण को उद्योगों के अंधाधुंध शोषण से सुरक्षित रखने के लिए उन्होंने लेह में शून्य से नीचे (-10°C) के तापमान में खुले आसमान के नीचे 21 दिनों तक केवल पानी और नमक के सहारे अनशन किया।
  • कड़कड़ाती ठंड में अनशन (जनवरी 2023): इससे पहले उन्होंने -20°C की ठंड में 5 दिनों का संकेतित 'जलवायु उपवास' कर वैश्विक समुदाय का ध्यान ग्लोबल वार्मिंग की ओर खींचा था।
  • लेह से दिल्ली 'क्लाइमेट मार्च' (अक्टूबर 2024): उन्होंने लद्दाख के नाजुक पर्यावरण और ग्लेशियरों की सुरक्षा की मांग को लेकर लेह से नई दिल्ली तक करीब 1,000 किलोमीटर लंबी पैदल पर्यावरण यात्रा का नेतृत्व किया।
लद्दाख आंदोलन और सोनम वांगचुक की प्रमुख मांगें
सोनम वांगचुक के जलवायु अनशन और आंदोलनों के पीछे केवल पर्यावरण को बचाना ही नहीं, बल्कि लद्दाख के स्थानीय लोगों के अधिकारों को सुरक्षित करना भी है। उनके इस आंदोलन की मुख्य मांगें निम्नलिखित हैं:
  • संविधान की छठी अनुसूची (Sixth Schedule) में शामिल करना: यह उनकी सबसे बड़ी मांग है। संविधान की छठी अनुसूची आदिवासी और जनजातीय क्षेत्रों को विशेष स्वायत्तता (Autonomy) देती है। इसके तहत लद्दाख के लोगों को अपनी जमीन, संस्कृति और प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा के लिए खुद कानून बनाने का अधिकार मिल जाएगा।
  • पूर्ण राज्य का दर्जा (Full Statehood): वर्तमान में लद्दाख एक केंद्र शासित प्रदेश (UT) है, जहां शासन सीधे केंद्र सरकार द्वारा चलाया जाता है। वांगचुक की मांग है कि लद्दाख को एक पूर्ण राज्य बनाया जाए, ताकि वहां की अपनी चुनी हुई सरकार और विधानसभा हो।
  • नाजुक पर्यावरण की सुरक्षा (Protection of Fragile Ecosystem ): लद्दाख के ग्लेशियर भारत और पूरे दक्षिण एशिया के लिए पानी के मुख्य स्रोत हैं। वांगचुक का कहना है कि यदि लद्दाख को विशेष सुरक्षा नहीं मिली, तो बड़े कॉर्पोरेट घराने वहां खनन (Mining), होटल उद्योग और फैक्ट्रियां शुरू कर देंगे। इससे वहां का संवेदनशील पर्यावरण और ग्लेशियर हमेशा के लिए नष्ट हो जाएंगे।
  • संसदीय प्रतिनिधित्व और नौकरियां: वे लद्दाख के लिए लोकसभा में दो सीटों (वर्तमान में केवल एक सीट है) और स्थानीय युवाओं के लिए सरकारी नौकरियों में विशेष आरक्षण की मांग कर रहे हैं, ताकि युवाओं का भविष्य सुरक्षित हो सके।
मुख्य पुरस्कार और सम्मान
सोनम वांगचुक के पर्यावरण, नवाचार और शिक्षा के क्षेत्र में किए गए कार्यों को दुनिया भर में सराहा गया है:
  • रेमन मैग्सेसे पुरस्कार (2018): इसे एशिया का नोबेल पुरस्कार माना जाता है।
  • ग्लोबल अवार्ड फॉर सस्टेनेबल आर्किटेक्चर (2017)
  • रोलेक्स अवार्ड्स फॉर एंटरप्राइज (2016)
निष्कर्ष
सोनम वांगचुक का जीवन और उनके आंदोलन हमें सिखाते हैं कि प्रकृति का संरक्षण और विकास दोनों साथ-साथ चल सकते हैं। वह दुनिया को लगातार यह संदेश दे रहे हैं कि यदि हमने आज हिमालय और उसके ग्लेशियरों को नहीं बचाया, तो आने वाली पीढ़ियों को पानी के भीषण संकट का सामना करना पड़ेगा। वह न केवल भारत के लिए, बल्कि पूरी दुनिया के लिए पर्यावरण संरक्षण की एक जीवंत मिसाल हैं।
पाठकों से मेरी एक विशेष अपील:
दोस्तों, सोनम वांगचुक की यह कहानी केवल लद्दाख की नहीं, बल्कि हम सभी के भविष्य की कहानी है। आज हिमालय के जो ग्लेशियर पिघल रहे हैं, वे आने वाले समय में पूरे भारत के लिए पानी के संकट का कारण बन सकते हैं। पर्यावरण की रक्षा केवल सरकारों की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि यह हम सब की जिम्मेदारी हैं।आपसे अनुरोध है कि, पर्यावरण संरक्षण के लिए योगदान दें, दैनिक जीवन में पानी और ऊर्जा (Electricity) की बर्बादी को रोकें।स्थानीय पर्यावरण को बचाने वाले इस संदेश और लेख को अपने दोस्तों और परिवार के साथ ज्यादा से ज्यादा शेयर करें।कमेंट बॉक्स में अपने विचार जरूर साझा करें कि हम सब मिलकर धरती को बचाने में क्या योगदान दे सकते हैं।

           लेखक: रंजीत कुमार कुशवाहा, संस्थापक एवं प्रधान संपादक, 'भारत को जानें' (Bharat Ko Jane)


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